नमस्कार दोस्तों,आप कैसे हैं,? आशा है कि आप अच्छे से होंगे। मैं आपके समक्ष नये-नये विषयों पर और रुचिकर आर्टीकल पेश करते रहता हूँ, जिसको पढ़ने से आपके मन को शाँति मिलती होगी।आज फिर से हम अपने जीवन से जुड़ी कुछ वास्तविक बातों पर चर्चा करने जा रहे हैं,जो कि आपको पसंद आएगी।
सीखने का नजरिया
मुझे इतना तो अनुभव है कि पाठशाला से मनुष्य वास्तव में अधूरे से भी कम ज्ञान प्राप्त कर पाता है और अपने जीवन में उससे कहीं अधिक बन भी जाता है। वहाँ पर वह केवल किताबी ज्ञान और उपदेशों को सुनकर उन्हें कंठस्थ तो कर सकता है परन्तु उनको क्रियात्मक रुप वह अपने दैनिक जीवन में ही दे सकता है। वास्तव में हम जो कुछ सीखते हैं वह किसी पाठशाला से नहीं वरन अपने जीवन की पाठशाला से ही हम 'सीखने' शब्द का सही अर्थ ले सकते हैं। शिक्षा पाने के लिए जब हम अपने चारों ओर दृष्टि डालते हैं तो हमें मालूम होता है कि हमारा एक - एक दृष्टि हमें सिखाता है, सीखने का अवसर देता है। सूर्य का उदय होना, पक्षियों का कलरव, पृथ्वी का इतने प्राणियों का बोझ उठाना यह सब सीख नहीं है तो और क्या है।
दुनिया एक शिक्षक है
दोस्तों हम अपने जीवन में रोज नये-नये बातों से संबंधित किसी न किसी माध्यम से कुछ न कुछ जरुर सीखते रहते हैं,जो हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं।स्कूल या काॅलेज जाकर ही हम कुछ शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं ऐसा नहीं है।शिक्षा प्राप्त करने के हजारों तरीके हैं,उन्हें अपने जीवन में अपनाकर हम शिक्षा जगत में उच्च पहल कर सकते हैं।ज्ञान अर्जन के घीसी-पीटी परम्पराओं को छोड़कर हमें नई-से-नई और आधुनिक-से-आधुनिक शिक्षा पध्दति को अपनाना चाहिए।इस समाज में रहने वाले अलग-अलग रीति-रिवाजों के लोगों से मिलकर उनसे बातचीत करके,हमें उनके संस्कारों को समझने और सीखने का प्रयत्न करना चाहिए। कूप मण्डूक की तरह घर में ही बैठे रहने से कुछ भी हासिल नहीं होगा।बाहरी दुनिया बहुत बड़ी है,इसका कण-कण हमारे लिए शिक्षक सिध्द हो सकते हैं। शिक्षा ग्रहण के समय किसी को तुच्छ नहीं समझना चाहिए ।छोटे-छोटे जीवों के द्वारा भी हम शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं। चींटी जैसे छोटे-छोटे प्राणियों से भी कुछ सीख सकते हैं।उनका परिश्रम,उनकी निष्ठा और उनके लगन को आपने देखा है और जानते भी हैं जो हमारे जीवन के लिए आत्मसात करने योग्य हैं
प्रकृति एक शिक्षक रुप में
प्रकृति से बड़ा शिक्षक कौन हो सकता है? जो हमें नियमों को मानने का संदेश देती है। प्रकृति हमें यह बताती है कि उसके नियमों का आचरण करके हम स्वास्थ्य सुख और प्रसन्नता का उपहार जीत सकते हैं। प्रकृति हमें संघर्षरत होने की सुदृढ़ता प्रदान करती है।यह हमें कठिनाईयों को सहने की शक्ति प्रदान करती है, ताकि हम ऐसे चरित्र का निर्माण करें जिससे महान उद्देश्यों की प्राप्ति हो सके। जैसे एक माँ अपने शिशु के आगे खिलौने रखती है,ताकि शिशु उसे पकड़ने के लिए अपना हाथ-पाँव हिलाए और शारीरिक अंगों में हृष्ट-पुष्ट भरा रहे।
बसंत ऋतु में फूले-फले वनों में से,पेड़-पौधों से आप मानवीय नैतिकता के बारे में इतना कुछ सीख सकते हैं, जितना कि समस्त संसार के ज्ञानी-विज्ञानी नहीं सीखा सकते। महत्वपूर्ण उद्देश्य होता है कि हम निष्ठापूूर्वक अपने कर्तव्यों पर बने रहें। हम आगे और ऊपर की ओर दृष्टि लगाए प्रगति के पथ पर बढ़ते रहें। प्रकृति बेकारी, आलस्यता और आवश्यकता से अधिक आराम को घृणा करती है। चाहे यह दुर्गुण गरीब में हो या अमीर में। ऐसे दुर्गण रखने वाले व्यक्तियों को वह निष्पक्ष रुप से बेकार घोषित करके उनके जीवन में उन्हें फेल कर देता है।
सबसे बड़ी पाठशाला
विद्यार्थी को स्कूल के जीवन से लेकर युवावस्था तक अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, चुनौतियों का सामना और उनका डटकर मुकाबला करना तो जीवन के अँतिम साँस तक हमारे साथ बँधा है। इससे लड़ने की शिक्षा किसी किताब या विद्यालय में उतनी नहीं दी जाती जितनी हमारी जिंदगी हमें देती है। 'जीवन' सबसे बड़ी पाठशाला का नाम है और परिस्थितियाँ अध्यापक जो समय-समय पर हमारी परीक्षा लेती रहती है।क्या आपने सागर को देखा है ? सागर स्वयं एक बहुत बड़ा महाकाव्य है। आवश्यकता है तो बस उस अंतरात्मा की जो उसमें गुंजरित ध्वनियों का ज्ञान रखता हो। आप सागर को देखकर अपनी ज्ञान- विज्ञान की तोतली बातें विस्मृत करें।नगर को देखें, नगर में बसने वाले मानव समूह को देखें जहाँ पर किस प्रकार हँसने, रोने, रुलाने वाली गाथाएँ हमारे समक्ष प्रस्तुत होता है ? एक ऐसा दृश्य जिसे किसी लिखित साहित्य से हम कभी साक्षात्कार नहीं हो सकते थे। जब उसे सजीव रुप में देखा तो जिन्दगी की परिभाषा और उसके रुप देखने को मिली।
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