प्रेम
मनुष्य के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण तत्व प्रेम है। हमारे हृदय में प्रेम रहने के कारण ही हम एक दूसरे के साथ मेल-मिलाप,आदर,और कुशल व्यवहार के साथ रह पातेहैं।अगर हममें एक दूसरे के प्रति प्रेम नहीं रख पाते हैं तो जरुर प्रेम की जगह ईर्ष्या का भाव होगा।क्योंकि प्रेम हमेशा लोगों को एक दूसरे के साथ जुड़कर रहना सीखाता है।
प्रेम की परिभाषा
वैसे तो प्रेम को शब्दों में परिभाषित नहीं किया जा सकता,तो पर भी प्रेम से संबंधित कुछ बातें जरुर लिखना चाहता हूँ। जिस प्रकार बहती हवा को और फूलों की खुशबू को हम देख नहीं सकते,उसको छू नहीं सकते,बस उन्हें केवल अनुभव किया जा सकता है; ठीक उसी प्रकार प्रेम को भी केवल अनुभव किया जा सकता है।वो भी परिमाण के अनुसार प्रेम का एहसास किसका प्रेम किसके प्रति कितना है,इसका अंदाजा लगा पाना मुश्किल है।आजके युवा पीढ़ी,लड़का-लड़की एक दूसरे से प्यार-मोहब्बत की बातें करते हैं,ईश्क करते हैं,इस प्रेम का मतलब वैसा नहीं है।प्रेम मानव जीवन के उस मधुरतम भावना को प्रकट करता है,जिसमें आदर, आनन्द,सहयोग, मेल,धीरज,नम्रता,दीनता,भलाई सभी सात्विक बातों का समावेश होता है ।
प्रेम की बातें
प्रेम धीरजवन्त और कृपाल होता है।प्रेम डाह नहीं करता ,अपनी बड़ाई नहीं करता।प्रेम अनरीति नहीं चलता ,प्रेम अपनी नहीं बल्कि दूसरों की भलाई खोजता है।प्रेम झुंझलाता नहीं,बुराई से बैर रखता है।प्रेम असत्य से आनन्दित नहीं होता है, बल्कि सत्य से आनन्दित होता है।प्रेम सब बातों को सह लेता है,सब बातों की प्रतीति करता है।प्रेम सब बातों में आशा रखता है,सब बातों में धीरज धरता है।प्रेम पीतल के समान ठनठनाता नहीं और झांझ के समान झंझनाता नहीं है ।प्रेम एक समर्पण है, प्रेम नि:स्वार्थ होता है।प्रेम एक आनन्द है और अनन्त है। प्रेम प्राकृतिक है सात्विक है।प्रेम दया हैऔर कृपा है।प्रेम में बुध्दि और बल बोता है,सामर्थ और शक्ति होता है। प्रेम के बिना हमारा जीवन अधूरा है।
प्रेम का प्रभाव
प्रेम ही हर विपत्ति में,हर संकट में टूटे हुए व्यक्ति को जोड़ देता है।प्रेम के प्रभाव का अनुभव एक पशु को देखकर लगाया जा सकता है।एक पशु को भी यदि प्रेमपूर्वक वश में लाया जाए तो वह अपने मालिक के इशारों पर नाचने लगता है। अमेरिका के सुप्रसिद्ध नगर न्यूयार्क में एक प्रदर्शनी लगी थी।उसमें एक अत्यंत आश्चर्यजनक करतब दिखाने वाले घोड़े को लाया गया था।पूछने पर उस घोड़े के मालिक ने बताया कि पाँच वर्ष पूर्व यह घोड़ा अत्यंत जिद्दी प्रकृति का था।न कुछ काम करता,न करने देता था।परंन्तु आज वह घोड़ा विनम्र प्रकृति का हो गया है,इतना ही नहीं वह मालिक के सारे कर्तव्यों को समझता और उसको पूरा भी करता है।
प्रेम के सहारे ही कोई व्यक्ति अपने शत्रु पर विजय प्राप्त कर सकता है।जिस प्रकार दया के प्रभाव से दुष्टता नष्ट हो जाती है,उसी प्रकार प्रेम मन में उठने वाले दुष्ट विचारों को नष्ट कर देता है।
प्रेम की आवश्यकता
प्रेम की आवश्यकता मनुष्य को उस समय से शुरु हो जाती है,जब वह बालक के रुप में माँ की गोद में रहता है।बिलख-बिलखकर रोता हुआ बालक जब माँ की गोद में प्रेम का अनुभव करता है तो माँ के प्रेम भरे दो-चार शब्द बच्चे के हृदय पर विचित्र प्रभाव डालते हैं।प्रेमपूर्वक व्यवहार के अभावों में बच्चा दुष्ट विचारों और भय पूर्व कल्पनाओं की ओर आकृष्ट हो जाता है।हमें भलीभांति समझ लेना चाहिए कि हम प्रेम के सहारे ही कष्टों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।जिस प्रकार कोई बड़ी-से-बड़ी शक्ति किसी कार्य को करवा सकती है,उसी प्रकार प्रेम में भी वह शक्ति है,जो असम्भव को भी सम्भव कर दिखाती है।
किसी भी व्यक्ति के सामने यदि प्रेमपूर्वक उसको सफलता ,उत्साह और विजय की बातें बताएँ,उन्नति का मार्ग बताएँ तो वह हर्षोल्लास से भरकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में तनिक भी देर नहीं लगायेगा।बाल्यावस्था से ही बच्चों में सुखद भविष्य की प्राप्ति तथा उन्नति के लिए सकारात्मक विचारों को डालना अत्यंत आवश्यक है।
प्रेम में सकारात्मक और नकारात्मक विचारों के लोग
बहुत से माता-पिता अपने सुयोग्य पुत्र और बुध्दिमान बालक स्तर को बिना ठीक प्रकार से सोचे-समझे यह कहते मिलेंगे कि तुम बुध्दिहीन हो,तुम्हारे अंदर कार्य करने की क्षमता ही नहीं है,तुम आगे नहीं बढ़ सकते इत्यादि।वास्तव में यह माता- पिता उन बालकों के विकास में बाधा हैं।
स्थिति उसी समय गंभीर हो जाती है जब उनके बार-बार यह शब्द कहने से बालक यह मान लेता है कि वह वास्तव में बुध्दिहीन है,वह तो कुछ कर नहीं सकता।
इसके विपरित कुछ माता-पिता यह समझ जाते हैं कि बच्चे को डाँटने-डपटने और मारने-पीटने की जगह उन्हें प्रेमपूर्वक तथा स्नेहपूर्वक समझाया जाए तो बच्चे अधिक सरल हो सकते हैं।प्रशंसा और प्रोत्साहन देने वाले विचार उनके जीवन के लिए प्रेरणादायक बन जाते हैं ।
बच्चों पर अपना नियंत्रण रखना जरुरी है।
अक्सर कुछ माता-पिता की यह शिकायत होती है कि उनके बच्चे उनकी आज्ञा का पालन नहीं करते हैं।परंतु वे कभी अपनी गलतियों के विषय में नहीं सोचते।जिस बच्चे को आपने बाल्यावस्था से ही डरा धमकाकर हर बात मनवाने का प्रयत्न किया है,जो जानता ही नहीं कि माता-पिता और संतान के मध्य प्यार जैसी भी कोई वस्तु संभव है।वह भला युवावस्था में पहुँचकर आपको प्रेम कैसे दे सकता है? प्रेमपूर्वक आपकी आज्ञा का पालन कैसे कर सकता है? जब तक वह बालक था तब तक उसे आपने डण्डे और धमकी के बल पर अपने वश में किया लेकिन इन चीजों का जोर तभी तक चल सकता है,जब तक आपका बच्चा जवानी के दिनों को स्वीकार नहीं कर लेता। ऐसे में एक बार पुन: माता-पिता अपनी पुरानी विधियों को अपनाकर उसको दबाना चाहेंगे,लेकिन युवावस्था के अथाह वेग से गुजरती आपकी संतान अब किसी भी धमकी या फटकार से रुकने वाली नहीं। भला नदी की तीव्र धारा को कोई दो हाथों से रोक पाया है।वह भी ऐसे समय में जब बाँध टूट गया हो। इसलिए ऐसे समय में प्रेम को अवश्य अपना लेना चाहिए।सावधानी रखें कि आपका बच्चा किसी दुष्कृत्य की ओर आकृष्ट हो इसके पूर्व ही आप उसे स्नेहपूर्वक रास्ते पर ले आएँ। आरम्भ से ही बच्चे को प्रेम देवें।
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